Tanashahi Se Lokshahi

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जीन शार्प (21 जनवरी, 1928–28 जनवरी, 2018) एक अमेरिकी राजनीति विज्ञानी थे। वे अल्बर्ट आइंस्टीन इंस्टीट्यूशन के संस्थापक थे, जो एक ग़ैर-लाभकारी संगठन है और अहिंसक कार्रवाई के अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है। उन्हें अहिंसक संघर्ष पर व्यापक लेखन के लिए जाना जाता है, जिन्होंने दुनिया-भर में कई सरकार विरोधी आन्दोलनों को प्रभावित किया। शार्प को 2015 में नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, और इससे पहले तीन बार 2009, 2012 और 2013 में नामांकित किया गया था। 2012 के पुरस्कार के लिए शार्प को व्यापक रूप से पसन्दीदा माना गया था। 2011 में उन्हें एल-हिबरी शान्ति शिक्षा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2012 में अहिंसक प्रतिरोध के मूल सिद्धान्तों और रणनीतियों को विकसित करने तथा दुनिया-भर में संघर्ष क्षेत्रों में व्यावहारिक कार्यान्वयन का समर्थन करने के लिए राइट लाइवलीहुड अवार्ड प्राप्त हुआ; साथ ही साथ विशिष्ट लाइफ़टाइम डेमोक्रेसी अवार्ड भी। उन्होंने अपनी मातृ संस्था ऑहियो स्टेट विश्वविद्यालय और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई की तथा मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय डार्टमाउथ व हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। अनिल यादव ‘जयहिंद’ पेशे से एक चिकित्सक एवं अस्पताल प्रशासक हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसेज से एम.बी.बी.एस. और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से पी.जी.डी.एच.एच.एम.। कामगारों के लिए ई.एस.आई. काॅरपोरेशन के अस्पतालों और योजनाओं के सुधार के लिए वाजपेयी सरकार में श्रम मंत्रालय द्वारा बनी समिति के सदस्य रहे। ‘नेताजी सुभाष का आह्वान’ पुस्तक के लेखक और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अरुंधति रॉय की पुस्तक ‘एक था डॉक्टर, एक था संत’ के अनुवादक हैं। वर्तमान में सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं।.

 

  • Language: Hindi
  • Binding: Paperback
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Genre: Non Fiction
  • ISBN: 9789389598711
  • Pages: 176
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SKU: 9789389598711 Category:

फ्रॉम डीक्टेटरशिप टू डेमोक्रेसी को मूलरूप से 1993 में अहिंसक संघर्ष के मार्गदर्शन के लिए लिखा गया था| चोरी-चोरी, चुपके-चुपके यह पुस्तक दुनियाभर के तमाम राजनीतिक असंतुष्टों के हाथों में पहुँच गयी| बाद में इसका तीस से अधिक भाषाओँ में अनुवाद किया गया| यह छोटी सी पुस्तिका इक्कीसवीं सदी के अहिंसावादी क्रांतिकारियों के लिए “कैसे-करें” की पथप्रदर्शक बन गयी है| अहिंसक विरोध प्रदर्शन और रक्तहीन क्रान्ति के सुझाव और व्यावहारिक नियम बताने वाली किताब है| क्रान्ति या बदलाव के झूठे सपने या कोई अकल्पनीय रास्ते नहीं बताती बल्कि लोगों को परिवर्तन के वास्तविक पहलू से परिचय कराती है| विश्व की तीस से अधिक भाषाओं में अनूदित और चर्चित बेस्टसेलर किताब। भारत में अहिंसक और असहयोग आन्दोलनों का लंबा इतिहास रहा है। हिन्दी में इस किताब का प्रकाशित होना इस इतिहास को और समृद्ध करेगा। यह आम और ख़ास हर तरह के उन पाठकों के लिए एक जरूरी किताब है जो बदलाव और अहिंसा के सम्बन्ध को आज के वैश्विक संदर्भों में समझना चाहते हैं। जिन्हें लोकतंत्र की परवाह है। अनुवादक ने किताब का अनुवाद करते हुए भाषा की सहजता का ध्यान रखा है। राजनीति, क्रान्ति और आन्दोलनों से जुड़ी शब्दावलियों को भी आसानी से समझने में मदद मिलती है।.

Additional information

Weight 0.4 kg
Dimensions 20 × 12 × 5 cm
brand

Natham publication

Genre

Non Fiction

Binding

Paperback

language

Hindi

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